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Desh Bhakti Kavita In Hindi

Desh Bhakti Kavita In Hindi

Desh Bhakti Kavita In Hindi – Namskar dosto aap sabhi ko desh bhakti kavita bolna ya likhna bahut pasand hai . Kai log Desh Bhakti Kavita In Hindi mai bolna bahut  pasand karte hai . Independence day aur republic day festivals par log desh bhakti kavita bolna pasand karte hai.

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Desh Bhakti Kavita In Hindi

Desh Bhakti Kavita In Hindi

देश लूटने की खातिर पग-पग पर दुश्मन बैठे हैं,
न जाने कहाँ-कहाँ से पैसे इन लोगों ने ऐंठे हैं,
बेंच दिया भारत मेरा, अब सन्यासी का रूप लिया,
धन काला वापस लाओ, अब झूठे मुह से ये कहते है,
जब सोने की चिड़िया थी तब, मुगलों ने बैर दिखाया था,
बचे -खुचे धन को लेने, फिर हिटलर भारत आया था,
कैसे-कैसे जतन किये, तब तो पाई आजादी थी,
आजाद, भगत जैसे वीरों ने अपनी जान गवाई थी,
फिर से वो वक़्त लौट आया अब कैसे देश बचायेंगे,
ये हिटलर के ही वंशज है, इंग्लिश झंडा फहराएंगे,
अभी समझ न पाए तुम तो, देर बहुत हो जाएगी,
लक्ष्मीबाई सरीखी नारी, क्रांति अलख जगाएगी,
तुम खुद से भी आँख मिलाने काबिल न रह पाओगे,
जैसे दुनिया में आये थे, वैसे दुनिया से जाओगे !!

 

पंद्रह अगस्त का दिन कहता आज़ादी अभी अधूरी है।
सपने सच होने बाकी है रावी की शपथ न पूरी है
जिनकी लाशों पर पग धर कर आज़ादी भारत में आई।
वे अब तक हैं खानाबदोश ग़म की काली बदली छाई
कलकत्ते के फुटपाथों पर जो आँधी-पानी सहते हैं।
उनसे पूछो, पंद्रह अगस्त के बारे में क्या कहते हैं
हिंदू के नाते उनका दु:ख सुनते यदि तुम्हें लाज आती।
तो सीमा के उस पार चलो सभ्यता जहाँ कुचली जाती

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भूख, गरीबी, लाचारी को, इस धरती से आज मिटायें,
भारत के भारतवासी को, उसके सब अधिकार दिलायें
आओ सब मिलकर नये रूप में गणतंत्र मनायें ।
गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें..!!

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तिरंगा हमारा हैं शान-ए-ज़िन्दगी,
वतन परस्ती हैं वफ़ा-ए-ज़मी,
देश के लिए मर मिटना कबूल हैं हमे,
अखण्ड भारत के स्वप्न का जूनून हैं हमे..!!

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लहराएगा तिरंगा अब सारे आस्मां पर,
भारत का नाम होगा सब की जुबान पर,
ले लेंगे उसकी जान या दे देंगे अपनी जान,
कोई जो उठाएगा आँख हमारे हिंदुस्तान पर..!!

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Desh Bhakti Kavita In Hindi

वीर तुम बड़े चलो
धीर तुम बड़े चलो
हाथ में ध्वजा रहे
बाल-दल सजा रहे
ध्वज कभी झुके नहीं

दल कभी रुके नहीं
वीर तुम बड़े चलो
धीर तुम बड़े चलो
सामने पहाड़ हो
सिंह का दहाड़ हो

तुम निडर हटो नहीं
तुम निडर डटो वही
वीर तुम बड़े चलो
धीर तुम बड़े चलो
मेघ गरजते रहे

मेघ बरसते रहे
बिजलियाँ कड़क उठे
बिजलियाँ तडके उठे
वीर तुम बड़े चलो
धीर तुम बड़े चलो

 

Desh Bhakti Kavita In Hindi

desh bhakti kavita in hindi for class 4

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
जिन्दगी का राज-चर्चा अपने क़त्ल का
मिट गया जब मिटने वाला
मुखम्मस-हैफ़ हम जिसपे कि तैयार थे मर जाने को
न चाहूँ मान दुनिया में, न चाहूँ स्वर्ग को जाना
हे मातृभूमि ! तेरे चरणों में सिर नवाऊँ
अरूज़े कामयाबी पर कभी तो हिन्दुस्तां होगा
भारत जननि तेरी जय हो विजय हो
ऐ मातृभूमि तेरी जय हो, सदा विजय हो
बला से हमको लटकाए अगर सरकार फांसी से-तराना
देश की ख़ातिर मेरी दुनिया में यह ताबीर हो
दुनिया से गुलामी का मैं नाम मिटा दूंगा
आज़ादी-इलाही ख़ैर ! वो हरदम नई बेदाद करते हैं
देश हित पैदा हुये हैं देश पर मर जायेंगे

Desh Bhakti Kavita In Hindi

जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा
वो भारत देश है मेरा
जहाँ सत्य, अहिंसा और धर्म का पग-पग लगता डेरा
वो भारत देश है मेरा

ये धरती वो जहाँ ऋषि मुनि जपते प्रभु नाम की माला
जहाँ हर बालक एक मोहन है और राधा हर एक बाला
जहाँ सूरज सबसे पहले आ कर डाले अपना फेरा
वो भारत देश है मेरा

अलबेलों की इस धरती के त्योहार भी हैं अलबेले
कहीं दीवाली की जगमग है कहीं हैं होली के मेले
जहाँ राग रंग और हँसी खुशी का चारों ओर है घेरा
वो भारत देश है मेरा

जब आसमान से बातें करते मंदिर और शिवाले
जहाँ किसी नगर में किसी द्वार पर कोई न ताला डाले
प्रेम की बंसी जहाँ बजाता है ये शाम सवेरा
वो भारत देश है मेरा

=> राजेंद्र किशन जी द्वारा लिखा गया है.

desh bhakti kavita in hindi mp3

प्रथम चरण है नये स्वर्ग का
है मंज़िल का छोर
इस जन-मंथन से उठ आई
पहली रत्न-हिलोर
अभी शेष है पूरी होना
जीवन-मुक्ता-डोर
क्यों कि नहीं मिट पाई दुख की
विगत साँवली कोर
ले युग की पतवार
बने अंबुधि समान रहना।

ऊंची हुई मशाल हमारी
आगे कठिन डगर है
शत्रु हट गया, लेकिन उसकी
छायाओं का डर है
शोषण से है मृत समाज
कमज़ोर हमारा घर है
किन्तु आ रहा नई ज़िन्दगी
यह विश्वास अमर है
जन-गंगा में ज्वार,

लहर तुम प्रवहमान रहना
पहरुए! सावधान रहना।।

– गिरिजाकुमार माथुर

Desh Bhakti Kavita In Hindi

ससुराल को किया प्रणाम प्यार का नाम,
मिला था लक्ष्मी बाई
थीं वैभव से आकंठ स्वयं बैकुंठ,
से चलकर, कुल में लक्ष्मी आई

नित ही नित मंद समीर ख़ुशी के तीर,
बही आनंद की धारा
लक्ष्मी थी बड़ी प्रसन्न था गदगद मन,
गर्भ में कुल का गौरव आया

था मुदित राजसी मन सभी जन जन,
थी घर घर यही कहानी
कुछ चार महीने मान हुआ अवसान,
शून्य हो गइ नन्ही ज़िन्दगानी

बिजली सी टूट गई थी रूठ गई,
ख़ुशी महलों में मातम
राजा दुःख सह न सके सहज ना रहे,
रोग से ग्रसित हो गया जीवन

 

desh bhakti kavita in hindi for class 3

भारत क्यों तेरी साँसों के,

स्वर आहत से लगते हैं,

अभी जियाले परवानों में,

आग बहुत-सी बाकी है।

क्यों तेरी आँखों में पानी,

आकर ठहरा-ठहरा है,

जब तेरी नदियों की लहरें,

डोल-डोल मदमाती हैं।

जो गुज़रा है वह तो कल था,

अब तो आज की बातें हैं,

और लड़े जो बेटे तेरे,

राज काज की बातें हैं,

चक्रवात पर, भूकंपों पर,

कभी किसी का ज़ोर नहीं,

और चली सीमा पर गोली,

सभ्य समाज की बातें हैं।

 

कल फिर तू क्यों, पेट बाँधकर सोया था, मैं सुनता हूँ,

जब तेरे खेतों की बाली, लहर-लहर इतराती है।

अगर बात करनी है उनको, काश्मीर पर करने दो,

अजय अहूजा, अधिकारी, नय्यर, जब्बर को मरने दो,

 

वो समझौता ए लाहौरी, याद नहीं कर पाएँगे, भूल कारगिल की गद्दारी,

नई मित्रता गढ़ने दो,ऐसी अटल अवस्था में भी, कल क्यों पल-पल टलता है,

जब मीठी परवेज़ी गोली, गीत सुना बहलाती है।

चलो ये माना थोड़ा गम है, पर किसको न होता है,

 

जब रातें जगने लगती हैं, तभी सवेरा सोता है,

जो अधिकारों पर बैठे हैं, वह उनका अधिकार ही है,

फसल काटता है कोई, और कोई उसको बोता है।

क्यों तू जीवन जटिल चक्र की, इस उलझन में फँसता है,

जब तेरी गोदी में बिजली कौंध-कौंध मुस्काती है।

– अभिनव शुक्ला

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